



नालंदा विश्वविद्यालय, भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र रहा है जो अपनी शिक्षा और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध था। यह विश्वविद्यालय गुप्त शासकों के शासनकाल से ही विद्या केंद्र के रूप में उभरा, लेकिन उसकी महत्वपूर्ण वृद्धि और प्रभावी विकास सम्राट हर्षवर्धन और उसके बाद भी हुआ।
नालंदा का स्थापना करीब 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में मानी जाती है, जब गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत यहां पर विद्यालय आरंभ किया गया था। इस विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से धर्म, दर्शन, वाङ्मय, विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, वास्तुकला, नृत्य और साहित्यिक अध्ययन का प्रचार-प्रसार था। इसका संबंध विभिन्न धार्मिक संस्कृतियों और विद्वानों से था, जिन्होंने यहां पर उच्च शिक्षा प्राप्त की।
नालंदा विश्वविद्यालय अपनी विशेषता और अनुपम गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था। यहां पर शिक्षक और छात्र दोनों के लिए विशेष आवासीय सुविधाएं थीं और विद्यालय की पुस्तकालय में बहुतायत की पुस्तकें और हस्तलिखित ग्रंथ थे। छात्र यहां शिक्षा प्राप्त करने के लिए पूरे विश्व से आते थे और विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं के प्रतिनिधित्व में यहां के अध्यापकों से शिक्षा लेते थे।
नालंदा विश्वविद्यालय के विकास की अवधि
नालंदा विश्वविद्यालय के विकास की अवधि में कई महान विद्वान और धार्मिक व्यक्तित्व इसके संदर्भ में योगदान दिया, जिनमें अरहंत महावीर, आचार्य नागर्जुन, आचार्य आर्यदेव, आचार्य आश्वघोष, आचार्य शान्तिदेव और अचार्य धर्मपाल जैसे व्यक्तित्व शामिल हैं।
नालंदा के विश्वविद्यालय का अवसान 12वीं शताब्दी के लगभग हुआ, जब मुसलमान शासक बक्तियार खिलजी ने इसे नष्ट कर दिया। इसके बाद से विश्वविद्यालय की भव्यता और उसकी महत्वपूर्ण यात्रा अंत हो गई।
आज, नालंदा विश्वविद्यालय का नाम सिर्फ एक स्मारिका ही नहीं, बल्कि विश्व की एक महत्वपूर्ण शिक्षा संस्था के रूप में भी जाना जाता है, जो अपने उच्च शैक्षिक मानक और विशेष संस्कृति के लिए प्रसिद्ध हुआ। इसकी धारा और इसकी परंपरा ने भारतीय और विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखा है, जो शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में सशक्त और समर्पित था।
नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान का भंडार


दुनिया भर में नालंदा विश्वविद्यालय को ज्ञान का भंडार माना गया है। इस विश्वविद्यालय में धार्मिक ग्रंथ, साहित्य, थियोलॉजी, ताराशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन, खगोलशास्त्र जैसे कई विषयों की पढ़ाई होती थी। उस समय जिन विषयों की शिक्षा यहां दी जाती थी, वे कहीं और उपलब्ध नहीं थे। 700 साल तक यह विश्वविद्यालय विश्व के लिए ज्ञान का स्रोत रहा। लंबी यात्रा के बाद, 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने इसे नष्ट कर दिया।


कहानी
कहा जाता है कि एक बार बख्तियार खिलजी बहुत अधिक बीमार पड़ गया जिसका इलाज करना उसके धर्म के लोगों के बस से बाहर था, तभी किसी ने बख्तियार खिलजी को बताया कि तुम्हारा इलाज केवल एक ही जगह हो सकता है वो है आचार्य राहुल श्री भद्र, ये बात सुनकर वे अपनी सेना लेकर नालंदा की या निकल पड़े, जहां जाने पर उसने आचार्य राहुल से कहा के अगर तुम सच में इतने ज्ञानी हो तो मुझे बिना छुए मेरा इलाज करके दिखाओ, और मैं काफिरों की दी हुई दवा खा नहीं सकता। आचार्य जी ने उसकी शर्त मान ली, और कुछ देर देर बाद उसको एक कुरान लाकर दी जिसके पन्नो पे दावा लगा दी थी खिलजी की जानकारी के बिना, और कहा इसे रोज पढ़ना, कुरान लेकर खिलजी वाहा से चला गया और नियमानुसर उसने वो कुरान पढ़ना शुरू किया जिसकी दवा उसके शरीर में पचने लगी





